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डिजिटल फार्मिंग से भरेगा दुनिया का पेट, बदल रही तकनीक, आधुनिक हो रहे किसान

तेजी से बढ़ती आबादी और खराब होती आबोहवा ने दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर दिया है। विशेषज्ञ इस बात की चिंता से दो चार हो रहे हैं कि अगर इसी तरह मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती रही, पानी की कमी होती रही या जलवायु परिवर्तन के चलते कम और खराब गुणवत्ता वाले खाद्यान्न उत्पादित होते रहे तो लोगों का कैसे पेट भरा जाए।

इसी क्रम में अब विशेषज्ञों ने ड़िजिटल फार्मिंग को इन सब मर्जों की एक दवा मानी है। उनका मानना है कि इसी तरीके से टिकाऊ खेती के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। स्वत: काम करने वाले रोबोट, ड्रोन, जीपीएस प्रणाली, अत्याधुनिक विज्ञान सहित दुनिया भर के किसान नई तकनीकों के इस्तेमाल से कम लागत में स्मार्ट खेती के तरीके से इस दिशा में कदम भी बढ़ा चुके हैं। भारत सहित अमेरिका, हंगरी, चीन और अफ्रीका के किसान टिकाऊ खेती के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करने लगे हैं।

आधुनिक किसान और कृषि शिक्षा
पुराने जमाने में खेती-किसानी को ऐसा पेशा माना जाता रहा है जिसमें वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वत: स्थानांतरित होता जाता था। अब हालत अलहदा है। आज के किसान डिजिटल ज्ञान और कौशल से लैस हैं। पिछले 30 साल में दुनिया भर में टिकाऊ खेती को लेकर हुई खोजें महज आर्थिक लाभ लेने से नहीं हुईं बल्कि इसने कृषि को उच्च शिक्षा के दायरे में भी शामिल किया। अमेरिका के कॉलेज और विश्वविद्यालय टिकाऊ खेती के 140 कोर्स पढ़ा रहे हैं। यह बताता है कि किस तरह से युवा पीढ़ी हमारे खाद्य सिस्टम को स्वस्थ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने को लेकर सचेष्ट है।

धन और समय की बचत
डिजिटल तकनीक खेती और उसके तौर-तरीकों को तेजी से बदल रही है। डाटा, पूर्वानुमान का विश्लेषण, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और समग्र खेती प्रबंधन ने किसानों का समय तो बचाया ही है, परंपरागत तौर से की जाने वाली उनकी खेती की लागत भी कम की है। इससे खेती में अप्रत्याशित सटीकता और कुशलता आई है।

तकनीक की तेजी
सेटेलाइट और ड्रोन खेतिहर किसानों को बता रहे हैं कि वे जमीनी स्तर पर अपनी फसलों का प्रबंधन कैसे करें। इनकी तस्वीरों से वे सही आकलन करने में सक्षम हैं कि उन्हें कब, कैसे और किस फसल की बुआई करनी है। सेटेलाइट से एकत्र आंकड़े स्मार्ट खेती में संभावनाओं का नया द्वार खोला है।

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