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52 हजार माइक्रोप्लास्टिक कण निगल रहे हम, ब्रांडेड पानी बोतल में भी मौजूद है ये प्रदूषण

पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन चुके जल और वायु प्रदूषण से बचने के लिए विश्वभर में नए-नए उपाय किए जा रहे हैं। हालांकि, प्लास्टिक प्रदूषण एक ऐसी समस्या बनकर उभर रही है, जिससे निपटना अब भी दुनिया के ज्यादातर देशों के लिए एक बड़ी चुनौती है। साल दर साल प्लास्टिक प्रदूषण हमारे पीने के पानी, भोजन और हवा को दूषित करता जा रहा है। हाल में हुए एक शोध के अनुसार एक वर्ष में 52 हजार से ज्यादा प्लास्टिक के माइक्रो कण खाने-पानी और सांस के जरिए इंसान के अंदर जा रहे हैं।

इंसानी शरीर को अंदर से प्रदूषित कर रहे प्लास्टिक के माइक्रों कणों की वजह, हमारे खाने, पानी, कपड़ों और रोजमर्रा की अन्य चीजों में तेजी से बढ़ रहा प्लास्टिक का प्रयोग है। प्लास्टिक का ये प्रदूषण इसलिए बेहद खतरनाक हैं क्योंकि इसके माइक्रो कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें सामान्य आंखों से देखना संभव नहीं है।

प्लास्टिक प्रदूषण कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां कोई प्रदूषण नहीं है, वहां भी प्लास्टिक मौजूद है। मतलब माइक्रोप्लास्टिक पृथ्वी पर हर जगह मिलने वाले कणों में से एक हैं। चाहे दुनिया के सबसे ऊंचे ग्लेशियर हों या सबसे गहरी समुद्री खाइयां।

पूर्व में हुए कई अध्ययनों से साबित हो चुका है कि प्लास्टिक के माइक्रो कण हमारे शरीर के अंदर कैसे पहुंच रहे हैं। पिछले साल हुए एक अध्ययन में पता चला था कि लगभग सभी ब्रांडेड बोतल बंद पानी में भी प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण मौजूद थे। प्लास्टिक कचरे और उससे होने वाले प्रदूषण को लेकर अब कनाडाई वैज्ञानिकों ने माइक्रोप्लास्टिक कणों का तमाम आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण किया है।

इस विश्लेषण में वैज्ञानिकों को चौंकाने वाले नतीजे मिले हैं। विश्लेषण में पता चला है कि एक व्यस्क पुरुष प्रतिवर्ष लगभग 52000 माइक्रोप्लास्टिक कण केवल पानी और भोजन के साथ निगल रहा है। इसमें अगर वायु प्रदूषण को भी मिला दें तो हर साल करीब 1,21,000 माइक्रोप्लास्टिक कण खाने-पानी और सांस के जरिए एक व्यस्क पुरुष के शरीर में जा रहे हैं।

भारत में प्लास्टिक प्रदूषण
भारत में अगर प्लास्टिक प्रदूषण की बात करें तो यहां ये समस्या और विकराल हो जाती है। यहां प्लास्टिक कचरे का निस्तारण तो दूर, इसके सही से कलेक्शन और रख-रखाव की व्यवस्था भी नहीं है। आलम ये है कि भारत में सड़क से लेकर नाली, सीवर और घरों के आसपास प्लास्टिक कचरा हर जगह नजर आता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन लगभग 26 हजार टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। भारत में हर साल प्रति व्यक्ति प्लास्टिक का प्रयोग औसतन 11 किलो है, जबकि अमेरिका में एक व्यक्ति द्वारा प्लास्टिक प्रयोग का सालाना औसत 109 किलो का है।

प्लास्टिक कचरे पर युद्ध के हालात
प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या कितनी विकराल है कि इसे लेकर की देशों के बीच युद्ध के हालात तक बन चुके हैं। कुछ वर्ष पहले फिलीपींस ने कनाडा को कचरा वापस न लेने पर युद्ध की चेतावनी दी थी। ये स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई, क्योंकि कनाडा ने फिलीपींस के रीसाइकलिंग के लिए कचरे के कुछ कंटेनर भेजे थे। फिलीपींस का आरोप था कि इन कंटेनरों में जहरीला प्लास्टिक कचरा भरा हुआ है। इसी मुद्दे पर दोनों देशों के बीच 2013-14 में शीत युद्ध भी चला। हाल में मलेशिया ने भी अमीर देशों का डंपिंग ग्राउंड बनने से इंकार कर दिया था। दरअसल मलेशिया को पिछले दिनों कई अमीर देशों से जहरीला प्लास्टिक कचरा कंटेनर में भरकर भेज दिया गया था, जिसे रिसाइकिल नहीं किया जा सकता था। मलेशिया ने चोरी-छिपे दूषित कचरा भेजने का आरोप लगाते हुए 60 कंटेनर ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा, जापान, सऊदी अरब और चीन को वापस भेजने की बात कही थी।

2022 प्लास्टिक मुक्त भारत
भारत 2018 में पूरी दुनिया के लिये पर्यावरण दिवस का होस्ट था। इस मौके पर भारत सरकार ने लभ्य निर्धारित किया था कि 2022 तक एक बार उपयोग कर फेंके जाने वाले प्लास्टिक को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा। इसके बाद सरकार स्तर पर प्लास्टिक को बैन करने के लिए कई प्रयास किए गए, लेकिन सख्ती के अभाव में इनका कोई असर होता नहीं दिख रहा है। ग्लोबल रिसोर्सेज फॉर इंसीनरेटर अल्टरनेटिव्स (GAIA) के अनुसार भारत विश्व के अन्य देशों से ज्यादा प्लास्टिक कचरा रीसाइकल करता है।



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